लिंग समानता- अब लड़कों से भी पूछेंगे समस्याएं ताकि बेवजह मर्दानगी के बोझ में न दबें

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चैतन्य भारत न्यूज

जयपुर. जब भी कभी लैंगिक समानता (Gender Equality) के बारे में बात की जाती है तो ज्यादातर लड़कियों का ही जिक्र होता है। ऐसे में लड़के एक बोझ के तहत दबकर रह जाते हैं और वो अपने मन की बात या परेशानियां किसी को नहीं बता पाते हैं। इसी को ध्यान में रखकर राजस्थान सरकार का शिक्षा विभाग और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमन (आइसीआरडब्ल्यू) नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने साथ मिलकर एक पहल की है, जिसमें राज्य के उदयपुर और सिरोही जिले के 400 स्कूलों में जेंडर इक्वेलिटी मूवमेंट फॉर बॉयज शुरू किया जा रहा है।


लड़कों को किस तरह का भेदभाव सहना पड़ता

बता दें राजस्थान में पहली बार इस तरह का कार्यक्रम हो रहा है। दोनों जिलों के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के करीब 400 सरकारी स्कूलों में 10 से 12 साल के बच्चों के बीच बातचीत और अन्य गतिविधियां आयोजित होंगी। इन बच्चों में ज्यादातर लड़कों को शामिल किया जाएगा। बातचीत के दौरान यह जानने का प्रयास किया जाएगा कि ऐसे कौन-कौनसे विषय हैं, जिनपर लड़के ज्यादा या खुलकर बातचीत नहीं कर पाते हैं। साथ ही लड़का होना किस तरह से बोझ बन गया है या भविष्य में बन सकता है, इस विषय पर भी चर्चा होगी। इसके अलावा लड़का होने के कारण उन्हें किस तरह से भेदभाव का सामना करना पड़ता है यह भी चर्चा के मुख्य मुद्दों में शामिल होगा। जानकारी के मुताबिक, सभी स्कूल के 20 हजार लड़के और 15 हजार लड़कियां कार्यक्रम में शामिल होंगे।

लड़कों को मर्दानगी को लेकर बोझ सहना पड़ता

संस्था के एशिया रीजनल डायरेक्टर डॉ. रवि वर्मा ने स्थानीय मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि, उन्होंने कई स्टडीज में यह पाया कि ‘लड़को को अपनी मर्दानगी को लेकर भारी बोझ सहना पड़ता है। इस वजह से वह कई बार खुलकर रो भी नहीं पाते हैं। यदि वह किसी बात को लेकर कमजोर भी पड़ रहे हैं तो किसी को दिखा या बता नहीं सकते हैं।’ डॉ. वर्मा ने कहा कि, ‘लड़कों पर शुरू से ही अनचाहा बोझ थोप दिया जाता है। चाहे घर हो या फिर स्कूल, हर जगह काम का बंटवारा लड़कों को आधार बनाकर ही किया जाता है। ऐसा लगता है जैसे लड़का होने के नाते सारी दुनिया का बोझ ये ही उठा रहे हैं या इन्हें ही उठाना है।’

किशोरावस्था से पहले के लड़कों से करेंगे बात

लैंगिक समानता के विषयों पर काफी समय से काम कर रहे डॉ. वर्मा ने बताया कि, ‘लड़कों पर इस अनचाहे बोझ के कारण ही आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले 18 से 24 साल के युवाओं के आते हैं। उनके मन में शुरू से ही यह बात बैठा दी जाती है कि चूंकि वो लड़का है इसलिए उन्हें लड़की और नौकरी को साथ लेकर अपनी दुनिया बसानी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें समाज का दबाव सहना पड़ेगा।’ डॉ. वर्मा ने कहा कि, वे इस कार्यक्रम के जरिए लड़कों के दिमाग में बैठे बोझ को कम करने की कोशिश करेंगे। किशोरावस्था तक लड़कों को दिमाग में यह बातें बैठा दी जाती है, इसलिए वे यह काम किशोरावस्था से पहले के लड़कों के बीच करेंगे। जानकारी के मुताबिक, यह कार्यक्रम दो साल तक चलेगा। इस दौरान संस्था 850 शिक्षकों को भी ट्रेनिंग देगी, जिससे कि वे इस कार्यक्रम को आगे चलाते रहें।

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