अनूठी परंपराः बाघों के गढ़ और दहाड़ के बीच जन्माष्टमी मेले में श्रीराम-जानकी के दर्शन

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चैतन्य भारत न्यूज

उमरिया (मप्र). बाघों की मौजूदगी से पूरे मप्र में अपनी अलग पहचान रखने वाले बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बने एक किले में स्थित श्रीराम- जानकी मंदिर अनूठी परंपरा का प्रतीक है। हर साल की तरह श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर आज यहां एक दिनी मेला लगा हुआ है। सुबह सात बजे से ही लोग श्रीराम-जानकी के दर्शन करने पहुंच रहे हैं।

नेशनल पार्क के ताला गेट से बांधवगढ़ किले तक का 15 किमी का सफर लोग पैदल ही तय करते हैं क्योंकि नेशनल पार्क में वाहन नहीं ले जाए जा सकते। सुबह 10 बजे तक ही प्रवेश दिया जाता है और दोपहर ढाई बजे तक श्रद्धालुओं को मंदिर छोड़ना पड़ेगा ताकि वे पांच बजे पार्क के बाहर हो सकें। श्रद्धालुओं को ताला गेट पर पंजीयन भी कराना जरूरी होता है। वापसी में उनके लौटने का भी हिसाब रखा जाता है।

साल में एक बार खुलता है श्रीराम-जानकी मंदिर

श्रीराम-जानकी मंदिर को वर्ष में सिर्फ एक बार आम लोगों के लिए खोला जाता है। किले की सीमा में ही भगवान विष्णु के 12 अवतारों की प्रतिमाएं पत्थरों को तराशकर बनाई गई हैं। इनमें कच्छप स्वरूप और शेष शैया पर आराम की मुद्रा में भी भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं।

पहरे में होते हैं दर्शन

लगभग 125 बाघों वाले बांधवगढ़ के जंगल में पैदल यात्रा खतरे से खाली नहीं होती। यही कारण है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पूरे रास्ते में सख्त पहरा होता है। पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों के अलावा सुरक्षा में विशेष रूप से कई अन्य लोगों को तैनात किया जाता है। हाथियों से गश्त की जाती है और जिप्सियों से भी पहरा दिया जाता है।

महाराजा मार्तंड सिंह ने रखी थी शर्त

कभी बघेल शासकों की शिकारगाह रहा बांधवगढ़ का जंगल जब टाइगर रिजर्व बनाने के लिए सौंपा गया, तब महाराजा मार्तंड सिंह ने सरकार के सामने शर्त रखी थी कि किले में लगने वाले मेले की परंपरा को खत्म नहीं किया जाएगा और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं को यहां आने से नहीं रोका जाएगा। यही कारण है कि हर साल एक दिन के लिए यहां वन्यजीव एक्ट भी शिथिल हो जाता है।

इतिहास और किंवदंतियां

बांधवगढ़ का नाम यहां मौजूद एक पहाड़ के नाम पर ही रखा गया है। इस पर स्थित एक ऐसा किला है जिसका निर्माण करीब दो हजार वर्ष पहले कराया गया था। किंवदंती है कि यह किला भगवान राम ने लक्ष्मण को भेंटस्वरूप प्रदान किया था इसलिए इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला है। इतिहास में रीवा रियासत के महाराज राजा व्याघ्रदेव द्वारा इसके निर्माण की जानकारी सामने आती है। इसका उल्लेख नारद-पंच और शिव पुराण में मिलता है। इस किले के अंदर जाने के लिए एक ही मार्ग है, जो घने जंगलों से होकर जाता है। इसके अंदर एक सुरंग बनी हुई थी जो सीधे रीवा निकलती थी।

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