आज है शीतला सप्तमी, जानिए रोगों को दूर करने वाली इस देवी की पूजा-विधि और महत्व

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चैतन्य भारत न्यूज

चैत्र मास की कृष्णपक्ष की सप्तमी को शीतला सप्तमी मनाई जाती है। यह त्योहार होली के सात दिन बाद मनाया जाता है। कई जगह इसे बासौड़ा भी कहते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि जो भक्‍त मां शीतला को प्रसन्‍न कर देता है, उसे सभी देवी-देवताओं का आर्शीवाद मिल जाता है। इस बार शीतला सप्तमी 15 मार्च को पड़ रही है। आइए जानते हैं शीतला सप्तमी का महत्व और पूजा-विधि।



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शीतला सप्तमी का महत्व

सप्तमी के दिन शीतला माता की पूजा का विशेष महत्व है। शीतला माता रोगों को दूर करने वाली माता मानी जाती हैं। मां शीतला को सौम्‍यता का प्रतीक माना गया है। इनके हाथ में झाड़ू और मटका होता है। झाड़ू सफाई का प्रतीक है और मां के दूसरे हाथ में रखे मटके में हजारों देवी-देवता वास करते हैं। इन्‍हें रोगों को दूर करने वाली माता माना जाता है।

शीतला माता की कृपा पूरे परिवार बनी रहे इसलिए शीतला सप्तमी-अष्टमी का उपवास भी रखा जाता है और इस दिन माता की पूजा की जाती है। मान्यता है कि, इस व्रत को रखने से महिलाओं को पुत्र की प्राप्ति होती है और वह स्वस्थ रहता है। इस व्रत में एक दिन पहले यानी चैत्र कृष्णा षष्ठी तिथि को बना हुआ भोजन किया जाता है , गर्म भोजन इस दिन वर्जित माना गया है। इसीलिए इस व्रत को बसियौरा या बसौड़ा भी बोला जाता है।

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शीतला सप्तमी की पूजा-विधि

  • शीतला सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाएं और स्वच्छ कपड़े धारण करें।
  • इसके बाद पूजा की थाली में दही, रोटी, बाजरा, सप्तमी को बने मीठे चावल, नमक पारे और मठरी रखें।
  • इसके अलावा दूसरी थाली में आटे से बना दीपक, रोली, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, मोली, सिक्के और मेहंदी रखें। साथ ही दोनों थाली के साथ में एक लोटे में ठंडा पानी रखें।
  • शीतला माता की पूजा करें और दीपक को बिना जलाए ही मंदिर में रखें।
  • पूजा के दौरान मेहंदी और कलावा सहित सभी सामग्री माता को अर्पित करें।
  • अंत में जल चढ़ाएं और थोड़ा जल बचाएं। इसे घर के सभी सदस्य आंखों पर लगाएं और थोड़ा जल घर के हर हिस्से में छिड़कें।
  • अगर पूजन सामग्री बच जाए तो ब्राह्मण को दान कर दें।

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