राज्यसभा में पेश हुआ ‘सरोगेसी बिल’, खूब हो रही इसकी आलोचना, जानें बिल में क्या-क्या प्रावधान हैं शामिल

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चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. संसद के शीतकालीन सत्र में मंगलवार को मोदी सरकार द्वारा सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल 2019 को राज्यसभा में पेश किया गया। यह बिल वाणिज्यिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाता है और साथ ही विवाहित, निसंतान दंपतियों के लिए करीबी रिश्तेदारों द्वारा केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है। बता दें लोकसभा में यह बिल जुलाई में ही पेश कर दिया गया था और अगस्त को यह पास भी हो गया था। लेकिन संसद के ऊपरी सदन में इस बिल को लेकर बहस जारी है।



बता दें बीजेपी की दूसरी बार सरकार बनने के बाद नई सरकार के पहले संसदीय सत्र के दौरान जुलाई में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन द्वारा 15 जुलाई को सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल 2019 को पेश किया था। मोदी सरकार की ओर से प्रस्तावित सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2019 में कई नए प्रावधान शामिल किए गए हैं। सरोगेसी बिल को ‘संस्कारी बिल’ कहकर इसकी आलोचना की जा रही है । दरअसल यह बिल अकेले रहने वाले पुरुषों और होमोसेक्सुअल पुरुषों के पिता बनने पर रोक लगाता है।

आइए जानते हैं क्या कहता है सरोगेसी बिल 2019

  • इस बिल के जरिए नेशनल सरोगेसी बोर्ड और स्टेट सरोगेसी बोर्ड का गठन किया जाएगा।
  • इस बिल में सरोगेसी पर निगरानी रखने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करने का भी प्रावधान।
  • बिल में मुताबिक, सरोगेसी की सुविधा सिर्फ उन्हीं दंपतियों को मिलेगी जिनकी शादी हुए 5 साल या उससे अधिक हो गए हो। यह सुविधा सिर्फ एक बार ही मिलेगी।
  • सरोगेसी सेवा देने वाले सरोगेसी क्लीनिक का रजिस्ट्रेशन होना जरुरी है।
  • नियम का उल्लंघन करने पर कम से कम 10 साल जेल की सजा और 10 लाख रुपए जुर्माना भी तय किया गया है।
  • भारतीय विवाहित जोड़ो के लिए सिर्फ ‘नैतिक परोपकारी सरोगेसी’ की अनुमति है। बिल के मुताबिक, महिला की उम्र 23-50 और पुरुष की उम्र 26-55 के बीच होनी चाहिए। बता दें ‘नैतिक परोपकारी सरोगेसी’ का अर्थ यह है कि सरोगेट मदर के मेडिकल खर्च और इंश्योरेंस कवर के अलावा यह बिना किसी खर्च के या फिर बिना पैसे या फीस के होनी चाहिए।
  • सरोगेट मदर दंपत्ति की कोई करीबी रिश्तेदार होनी चाहिए या फिर कोई ऐसी महिला होनी चाहिए जिसकी शादी हो चुकी हो और उसका अपना बच्चा हो और उसकी उम्र 25-35 साल की होनी चाहिए। बिल के मुताबिक, एक महिला को अपने जीवन में एक बार ही सरोगेट मदर बनने की अनुमति प्राप्त है।
  • सरोगेसी के केस में गर्भ को तभी हटाया जा सकता है जब सरोगेट मदर की लिखित में अनुमति हो। साथ ही उचित प्राधिकारी की भी अनुमति हो।
  • सरोगेसी बिल सरोगेसी के जरिए पैदा होने वाले बच्चे का परित्याग रोकने का भी प्रावधान करता है और उसके वे सारे अधिकार सुनिश्चित करता है जो कि किसी जैविक पुत्र के होते हैं।

‘संस्कारी बिल’ पर विरोध क्यों?

कहा जा रहा है कि यह बिल पुरुष के लिए पिता बनने के अधिकार को छीनता है। बिल को लेकर सबसे ज्यादा विरोध शादीशुदा दंपति वाले प्रावधान को लेकर हो रहा है। दरअसल, इस बिल के प्रावधानों के मुताबिक, सरोगेसी की सुविधा सिर्फ शादीशुदा दंपति को ही मिलेगी और सिंगल व होमोसेक्सुएल पुरुष इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पाएंगे। साथ ही सेरोगेसी बिल विदेशी, तलाकशुदा, लिव-इन कपल, विधुर और विधवा लोगों को भी यह सुविधा लेने पर रोक लगाता है।

2016 में भी पेश हुआ था बिल

सरोगेसी के दुरुपयोग को रोकने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान साल 2016 में इस बिल को संसद में पेश किया था। 2016 में बिल को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि, ‘यह विधेयक लाना बेहद जरूरी था क्योंकि जो चीजें जरूरत के नाम पर शुरू की गई थी वो अब शौक बन गई है।’ लेकिन अब इस बिल के नए प्रारूप को सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2019 के नाम से पेश किया गया है। इस बिल का मकसद किराए की कोख का व्यावसायिक इस्तेमाल करने पर रोक लगाना है।

क्या होता है सरोगेसी

जब किसी दूसरी महिला की कोख को किराए पर लिया जाता है तो उसे सरोगेसी कहा जाता है। जो महिला अपनी कोख में दूसरे का बच्चा पालती है उसे सरोगेट मदर कहते हैं। पिछले काफी समय से यह आरोप लगाया जा रहा था कि कुछ लोग पैसों के दम पर आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं की कोख का दुरुपयोग कर रहे हैं। ऐसे में महिलाओं को सेहत से जुड़ी कई समस्याएं पैदा हो रही थी, जिसके बाद यह प्रावधान बनाया गया है।

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