त्रिपुरा के मंदिरों में पशु-पक्षियों की बलि पर हाई कोर्ट की रोक, कहा- यह धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं

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चैतन्य भारत न्यूज

अगरतला (त्रिपुरा)। त्रिपुरा हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य के किसी भी मंदिर में पशुओं या पक्षियों की बलि देने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कोर्ट ने यह फैसला सेवानिवृत्त जिला जज सुभाष भट्टाचार्जी द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनाया है। हाई कोर्ट के अनुसार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत पशु- पक्षियों को भी जीवन का मौलिक अधिकार है। हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट में पशु बलि की वकालत करते हुए कहा था कि यह हिंदू रीति-रिवाजों में लंबे समय से चली आ रही प्रक्रिया है।



चीफ जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अरिंदम लोध की बेंच ने यह फैसला सुनाया। बेंच ने फैसले में कहा है कि राज्य समेत किसी भी व्यक्ति को किसी भी मंदिर परिसर में पशु /पक्षी की बलि देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पशुओं की बलि धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं, वह जीवन के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। बेंच ने यह निर्देश विशेष रूप से माता त्रिपुरेश्वरी देवी मंदिर और चतुरदास देवता मंदिर में बलि के खिलाफ लगी याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कहा गया था कि मंदिरों में अंधविश्वास के चलते राज्य सरकार के संरक्षण में पशु- पक्षियों की बलि दी जा रही है।

हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव, सभी कलेक्टर और एसपी को प्रतिबंध का पालन कराने का निर्देश दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को त्रिपुरेश्वरी मंदिर और चतुरदास मंदिर में कैमरे लगाने का भी आदेश दिया। उधर, पशु अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे धर्म के नाम पर जानवरों के प्रति सदियों पुरानी क्रूरता का अंत होगा। हाई कोर्ट ने अपने 72 पेज के फैसले में नेपाल के गुधिमा मंदिर और हिमाचल प्रदेश के एक बहुत पुराने मंदिर में भी इस तरह की प्रथा के बंद होने का हवाला दिया।

गौरतलब है कि देवी त्रिपुरेश्वरी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और यह करीब 518 साल पुराना है। याचिका के जवाब में राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में कहा कि बलि देना हिंदू अनुष्ठानों की तांत्रिक विधि से दश महाविद्या की पूजा की लंबे समय से स्वीकृत प्रक्रिया है। याचिकाकर्ता केवल हिंदू धर्म में पशु बलि के मुद्दे तक सीमित है और उन्होंने ईद-उल-जुहा पर दी जाने वाली पशु बलि को चुनौती नहीं दी।

दावा- विलय के समझौते में रीति-रिवाजों को जारी रखना भी था शामिल

दरअसल, 15 अक्टूबर, 1949 को त्रिपुरा का भारत में विलय हुआ था। विलय के समझौते पर महारानी कंचन प्रभा देवी और भारतीय गवर्नर जनरल ने हस्ताक्षर किेए थे। समझौते में कई पारंपरिक जनजातीय पूजा और माता त्रिपुर सुंदरी सहित 14 मंदिरों में चल रहे रीति-रिवाजों को जारी रखना भी शामिल था। इसमें विशेष बात यह भी है कि इन मंदिरों के संरक्षक जिला मजिस्ट्रेट होते हैं, जिन पर पशु बलि सहित सभी अनुष्ठान कराने की जिम्मेदारी होती है। राज्य सरकार इसका पूरा खर्च वहन करती है। त्रिपुरा के आठ जिलों में से चार जिलों में जिला मजिस्ट्रेटों के अधीन एक पूरा विभाग है, जिसे ‘देबअर्चन विभाग” कहा जाता है।

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