वृश्चिक सक्रांति : सूर्यदेव की पूजा से दूर हो जाते हैं हर रोग, जानिए इसका महत्व और पूजा-विधि

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चैतन्य भारत न्यूज

हिंदू धर्म के मुताबिक, साल में 12 संक्रांति आती हैं और हर राशि में सूर्यदेव एक माह तक रहते हैं। सूर्यदेव के इसी भ्रमण की स्थिति को संक्रांति कहा जाता है। सूर्यदेव जब तुला राशि से वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं तो उसे वृश्चिक संक्रांति कहा जाता है। इस बार वृश्चिक संक्रांति 17 को पड़ रही है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव की पूजा से हर रोग दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं वृश्चिक संक्रांति का महत्व और पूजन-विधि।



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वृश्चिक संक्रांति का महत्व 

ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, 12 राशियों में सूर्य के प्रवेश को संक्रांति कहते हैं। सूर्य 12 राशियों में, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशियों में प्रवेश करते हैं। जिस तरह जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति मनाई जाती है। उसी तरह जब सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करता है तो इस दिन वृश्चिक राशि मनाई जाती है।

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इस दिन को पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। वृश्चिक संक्रांति का दिन धार्मिक कार्यों के लिए बहुत शुभ माना जाता है। वृश्चिक संक्रांति पर व्रत पूजन करने से धन से जुड़ी समस्याओं का निदान होता है। इस दिन श्राद्ध और पितृ तर्पण का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान सूर्य की उपासना की जाती है। साथ ही सूर्योदय के समय उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। सिर्फ यही नहीं सुबह उठकर विष्णु भगवान की पूजा करना शुभ होता है।

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वृश्चिक संक्रांति पूजन-विधि

  • इस दिन सूर्योदय से पहले उठ स्नान कर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए।
  • पानी में लाल चंदन मिलाकर तांबे के लोटे से सूर्य को जल चढ़ाएं। साथ ही रोली, हल्दी व सिंदूर मिश्रित जल से सूर्यदेव को अर्घ्य दें।
  • इसके बाद सूर्य देव को लाल फूल चढ़ाएं।
  • सूर्यदेव को गुड़ से बने हलवे का भोग लगाएं।
  • इसके बाद लाल चंदन की माला से ‘ॐ भास्कराय नमः’ मंत्र का जाप करें।
  • पूजन के बाद नैवेद्य लगाएं और उसे प्रसाद के रूप में बांट दें।

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