जानिए क्या होता है ‘डेथ वारंट’? जिसके जारी होने के 15 दिन बाद दोषी को दी जाती है फांसी

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चैतन्य भारत न्यूज

नई दिल्ली. निर्भया के दोषियों को 22 जनवरी को सुबह 7 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी जाएगी। देश को दहला देने वाले निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और उसकी मौत के मामले में गुनहगारों के खिलाफ दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने मंगलवार को ‘डेथ वारंट’ जारी किया। डेथ वारंट को फार्म नंबर 42 और ब्लैक वारंट भी कहा जाता है। दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) का फॉर्म नंबर 42 असल में, दोषी को फांसी की सजा का अनिवार्य आदेश है, जिसे मौत की सजा सुनाई गई है। ये जारी होने के बाद ही किसी व्यक्ति को 15 दिनों के भीतर ही फांसी दी जाती है। आइए जानते हैं आखिर कैसे तैयार होता है डेथ वारंट।


क्या होता है डेथ वारंट

डेथ वारंट का सीधा सा अर्थ होता है कि मौत का फरमान। यानी यदि मृत्‍युदंड की सजा सुनाए जा चुके किसी दोषी का यह वारंट जारी किया गया है तो इसका मतलब हुआ कि उसे फांसी पर लटकाया जाना तय है। यह वारंट सजा-ए-मौत की पुष्टि है।  दंड प्रक्रिया संहिता में डेथ वारंट 42वां फॉर्म होता है जिसे ‘वारंट ऑफ एग्जीक्यूशन ऑफ ए सेंटेंस ऑफ डेथ’ कहा जाता है।

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फॉर्म नंबर 42 के पहले कॉलम में उस जेल का नंबर लिखा होता है, जिसमें दोषियों को फांसी दी जाएगी। उसके बाद अगले कॉलम में फांसी पर चढ़ने वाले सभी दोषियों के नाम लिखे जाते हैं। फिर अगले खाली कॉलम में केस का एफआईआर (FIR) यानी केस नंबर लिखा जाता है। उसके बाद के कॉलम में किस दिन ब्लैक वारंट जारी हो रहा है वो तारीख पहले लिखी जाती है। इसके बाद फांसी के दिन की तारीख, समय और किस जगह फांसी दी जाएगी ये लिखा जाता है।

कोर्ट द्वारा डेथ वारंट जारी करने के बाद इसे लाल लिफाफे में बंद करके संबंधित जेल भेज दिया जाता है। इसके बाद दोषी के परिवार को फांसी दिए जाने के बाबत सूचित किया जाता है। डेथ वारंट जारी होने के बाद दोषी को जेल में कोई काम नहीं दिया जाता है। उस पर चौबीस घंटे, सातों दिन निगरानी रखी जाती है। साथ ही दोषी का दिन में दो बार मेडिकल चेकअप भी किया जाता है।

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