ये हैं श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र स्थान, जहां शत-प्रतिशत पितरों को मिलता हैं मोक्ष

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चैतन्य भारत न्यूज

पितरों के प्रति श्रद्धा और समर्पण के भाव से किए जाने वाले संस्‍कार को श्राद्ध कहा जाता है। पितरों का श्राद्ध करने में सर्वाधिक महत्‍व उस स्‍थान का होता है, जहां पिडदान किया जाता है। मान्यता है कि पिंडदान करने के लिए वह स्‍थान चुनना सबसे जरूरी होता है, जो सर्वथा पवित्र और मोक्षदायी हो। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे ही स्थानों के बारे में जहां श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्त होती है।



ब्रह्मकपाल, उत्तराखंड

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उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम के पास अलकनंदा नदी के किनारे ब्रह्मकपाल तीर्थ क्षेत्र स्थित है। ब्रह्मकपाल को श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र स्थान माना गया है। यह स्थान बद्रीनाथ धाम के पास ही है। कहा जाता है कि ब्रह्मकपाल में श्राद्ध कर्म करने के बाद पूर्वजों की आत्माएं तृप्त होती हैं और उनको स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।ब्रह्मकपाल तीर्थ पुरोहित संघ के अध्यक्ष पं. उमेश सती ने बताया कि हर साल पितृ पक्ष में देशभर से करीब एक लाख लोग पिंडदान करने यहां आते हैं। इस बार पिंडदान हो सकेंगे या नहीं, स्थिति स्पष्ट नहीं है। फिलहाल, यहां पिंडदान नहीं किए जा रहे हैं।

सिद्धनाथ, मध्य प्रदेश

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श्राद्ध कर्म के लिए इस तीर्थ का विशेष महत्व है। हर मास की कृष्ण चतुर्दशी तथा श्राद्ध पक्ष में यहां दूर-दूर से लोग पिंडदान व तर्पण करने आते हैं। कहते हैं कि यहां किया गया श्राद्ध सिद्ध योगियों को ही नसीब होता है। सिद्धनाथ तीर्थ मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे है। मध्य प्रदेश के उज्जैन के सिद्धनाथ घाट के तीर्थ पुरोहित पं. राजेश त्रिवेदी ने बताया कि, यहां पिंडदान और इससे संबंधित कर्म शुरू हो चुके हैं। श्राद्ध पक्ष में भी श्रद्धालु यहां पिंडदान करने आ सकते हैं। यहां पर तय गाइड लाइन पर ही पिंडदान हो रहे हैं। यजमान और पुजारी मास्क लगाकर, सुरक्षित शारीरिक दूरी के साथ विधान पूरा कर रहे हैं। घाटों पर सैनेटाइजेशन किया जा रहा है। इस समय में शिप्रा नदी में स्नान करना वर्जित है, तो ट्यूबवेल से स्नान कराया जा रहा है। ठहरने के लिए होटल्स और धर्मशालाएं भी खुल चुके हैं। इस वजह से लोगों को यहां रहने में पिंडदान करवाने में परेशानी कम है। हर साल यहां करीब 2 लाख से ज्यादा लोग पितृपक्ष में आते हैं।

पिंडारक, गुजरात

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यह जगह गुजरात में द्वारिका से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर है। यहां एक सरोवर है, जिसमें यात्री श्राद्ध करके दिए हुए पिंड सरोवर में डाल देते हैं। खास बात यह है कि वे पिंड सरोवर में डूबते नहीं बल्कि तैरते रहते हैं। यहां कपालमोचन महादेव, मोटेश्वर महादेव और ब्रह्माजी का मंदिर हैं।

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