जन्मदिन विशेष : कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक भाषा चाहते थे महार्षि दयानंद सरस्वती, जानें उनसे जुड़ी खास बातें

dayanand saraswati

चैतन्य भारत न्यूज

आर्य समाज के संस्थापक महार्षि दयानंद सरस्वती की आज जयंती है। दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के तनकारा में हुआ था। जबकि हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती मनाई जाती है। दयानंद सरस्वती ने अपना सारा जीवन मानव कल्याण और विश्व की एकता के प्रति समर्पित किया। उनका जन्मदिन ‘महार्षि दयानंद जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं दयानंद सरस्वती से जुड़ी खास बातें…



dayanand saraswati

  • दयानंद का जन्म गुजरात के राजकोट जिले के काठियावाड़ क्षेत्र में टंकारा गांव के निकट मौरवी नामक स्थान पर संपन्न एवं श्रेष्ठ ब्राहा्रण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम अंबाशंकर और माता का नाम यशोदा बाई था।
  • दयानंद के बचपन का नाम मूलशंकर था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। वे तीन भाईयों और दो बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने मात्र 5 वर्ष की आयु में ‘देवनागरी लिपि’ का ज्ञान हासिल कर लिया था और संपूर्ण यजुर्वेद कंठस्थ कर लिया था।

dayanand saraswati

  • दयानंद हिंदी भाषा के प्रचारक थे। उनकी इच्छा थी कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे देश की एक भाषा हो। उन्होंने 10 अप्रैल 1875 को मुंबई के गिरगांव में आर्य समाज की स्थापना की थी। आर्य समाज का आदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, जिसका अर्थ है – विश्व को आर्य बनाते चलो। आर्य समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति है। आर्य समाज ने कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पैदा किए थे। आजादी से पहले आर्य समाज को क्रांतिकारियों को अड्डा कहा जाता था।

dayanand saraswati

  • दयानंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों और रूढियों-बुराइयों को दूर करने के लिए, निर्भय होकर उन पर आक्रमण किया। जिसके चलते वह ‘संन्यासी योद्धा’ कहलाए।
  • दयानंद ने सिर्फ हिंदू ही नहीं बल्कि ईसाई और इस्लाम धर्म में फैली बुराइयों का कड़ा खण्डन किया। उन्होंने अपने महाग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है। उन्होंने वेदों का प्रचार करने और उनकी महत्ता लोगों को समझाने के लिए देश भर में भ्रमण किया।
  • दयानंद का देहांत साल 1883 को दीपावली के दिन संध्या के समय हुआ। दयानंद अपने पीछे एक सिद्धांत छोड़ गए, ”कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ। उनके अंतिम शब्द थे – ‘प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।’

Related posts