जानिए क्यों जगन्नाथपुरी में भगवान कृष्ण संग भाई बलराम और बहन सुभद्रा की होती है पूजा?

चैतन्य भारत न्यूज

12 जुलाई से जगन्नाथपुरी की रथयात्रा आरंभ हो गई है। महाप्रभु की रथ यात्रा का समापन आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर होता है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है। लगभग सभी जगह आप भगवान कृष्ण की मूर्ति देखेंगे तो उनके साथ राधा जी विराजमान रहती हैं। कुछ एक मंदिर रुक्मणि के साथ भी हैं और कुछ मंदिर अपने बड़े भाई बलराम के साथ। लेकिन जगन्नाथपुरी मंदिर में भगवान कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ विराजमान हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इसके पीछे क्या कारण है? इसके पीछे एक महत्वपूर्ण पौराणिक कथा है।

ये है रहस्य

कहते हैं हरि अंनत हरि कथा अनंता अर्थात लीलाधारी भगवान की लीलाओं को देवता भी नहीं समझ पाते हैं। एक बार द्वारकापुरी में भगवान श्री कृष्ण रात में सोते समय अचानक नींद में राधे-राधे बोलने लगे। भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मणि ने जब सुना तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने भगवान की यह बात अन्य सभी रानियों को भी बताई। सभी रानियां आपस में विचार करने लगीं कि भगवान कृष्ण अभी तक राधा को नहीं भूले हैं। सभी रानियां राधा के बारे में चर्चा करने के लिए माता रोहिणी के पास पहुंचीं। माता रोहिणी से सभी रानियों ने आग्रह किया कि भगवान कृष्ण की गोपिकाओं के साथ हुई रहस्यात्मक रासलीला के बारे में बताएं।

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पहले तो माता रोहिणी ने उन सभी को टालना चाहा, लेकिन महारानियों के हठ करने पर कहा- ठीक है सुनो, सुभद्रा को पहले पहरे पर बिठा दो, कोई अंदर न आने पाए, भले ही बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों। माता रोहिणी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की रहस्यात्मक रासलीला की कथा शुरू करते ही श्रीकृष्ण और बलराम अचानक महल की ओर आते दिखाई दिए। देवी सुभद्रा ने अपने दोनों भाईयों को उचित कारण बता कर दरवाजे पर ही रोक लिया।

महल के अंदर से श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की कथा श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम तीनों को ही सुनाई दे रही थी। उसको सुनने से श्रीकृष्ण और बलराम के अंग अंग में अद्भुत प्रेम रस का उद्भव होने लगा। साथ ही बहन सुभद्रा भी भाव विह्वल होने लगीं। तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिखते थे। अचानक वहां पर देवऋषि नारद वहां आ गए। नारदजी को देखकर तीनों पूर्ण चेतना में वापस लौटे। नारद जी ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की कि हे भगवान आप तीनों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य जनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहें। भगवान श्री कृष्ण ने तथास्तु कह दिया। कहते हैं भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी का वही स्वरूप आज भी जगन्नाथपुरी में है,जिसे स्वयं विश्वकर्मा जी ने बनाया था।

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