क्या हैं वो तीन कानून, जिसके विरोध में दिल्ली पहुंच रहे 1 लाख किसान? यहां सरल भाषा में जानें सब कुछ

चैतन्य भारत न्यूज

पंजाब के हजारों किसान, जिनमें से अधिकतर वरिष्ठ नागरिक हैं, पिछले दो महीनों से तीन नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। दरअसल, इस साल जून के महीने में मोदी सरकार कृषि सुधार से जुड़े तीन अध्यादेश लेकर आई थी। हालांकि, सितंबर महीने में इन अध्यादेशों की जगह सरकार ने संसद में तीन बिल पेश किए। तीनों बिल पास हो गए और राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई। इसके बाद से ही किसानों का प्रदर्शन शुरू हो गया। कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब-हरियाणा के किसान 26 से 28 नवंबर तक ‘दिल्ली मार्च’ निकाल रहे हैं। पंजाब के किसान संगठनों का दावा है कि इस प्रदर्शन में 1 लाख से ज्यादा किसान जुटेंगे। आखिर क्यों किसान दिल्ली पहुंचने पर अड़े हैं? क्या हैं वो तीन कानून जिसको लेकर विरोध हो रहा है? आइए जानते हैं…

कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य कानून-2020

राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद इस कानून के तहत अब किसान देश के किसी भी हिस्से में अपना उत्पाद बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। इससे पहले की फसल खरीद प्रणाली उनके प्रतिकूल थी।

  • इच्छा के अनुरूप उत्पाद को बेचने के लिए आजाद नहीं है।
  • भंडारण की व्यवस्था नहीं है, इसलिए वे कीमत अच्छी होने का इंतजार नहीं कर सकते।
  • खरीद में देरी पर एमएसपी से काफी कम कीमत पर फसलों को बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
  • कमीशन एजेंट किसानों को खेती व निजी जरूरतों के लिए रुपये उधार देते हैं। औसतन हर एजेंट के साथ 50-100 किसान जुड़े होते हैं।
  • अक्सर एजेंट बहुत कम कीमत पर फसल खरीदकर उसका भंडारण कर लेते हैं और अगले सीजन में उसकी एमएसपी पर बिक्री करते हैं।
  • नए कानून से किसानों को ऐसे होगा लाभ अपने लिए बाजार का चुनाव कर सकते हैं।
  • अपने या दूसरे राज्य में स्थित कोल्ड स्टोर, भंडारण गृह या प्रसंस्करण इकाइयों को कृषि उत्पाद बेच सकते हैं।
  • फसलों की सीधी बिक्री से एजेंट को कमीशन नहीं देना होगा।
  • न तो परिवहन शुल्क देना होगा न ही सेस या लेवी देनी होगी।
  • इसके बाद मंडियों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी होना होगा।

मूल्य आश्वासन व कृषि सेवा कानून-2020

इसके कानून बनने के बाद किसान अनुबंध के आधार पर खेती के लिए आजाद हो गए हैं। हालांकि, इन कारणों से हो रहा विरोध

  • किसानों का कहना है कि फसल की कीमत तय करने व विवाद की स्थिति का बड़ी कंपनियां लाभ उठाने का प्रयास करेंगी।
  • बड़ी कंपनियां छोटे किसानों के साथ समझौता नहीं करेंगी।
  • मौजूदा अनुबंध कृषि का स्वरूप अलिखित है। फिलहाल निर्यात होने लायक आलू, गन्ना, कपास, चाय, कॉफी व फूलों के उत्पादन के लिए ही अनुबंध किया जाता है।
  • कुछ राज्यों ने मौजूदा कृषि कानून के तहत अनुबंध कृषि के लिए नियम बनाए हैं।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून-2020

इस बिल के तहत अनाज, दलहन, तिलहन, खाने वाले तेल, प्याज व आलू को आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान है। इसके बाद युद्ध व प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों को छोड़कर भंडारण की कोई सीमा नहीं रह जाएगी।

केंद्रीय कृषि कानून वापस हों

केंद्र के तीन कृषि सुधार कानूनों को वापस लिए जाना किसानों की सबसे अहम मांग है। किसान यूनियनों का कहना है कि ये कानून किसानों के पक्ष में नहीं हैं, इससे कृषि के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही जमाखोरों और बड़े कॉर्पोरेट घरानों को फायदा होगा। किसान यूनियनों की ओर से एक धारणा बनाई गई है कि अगर इन कानूनों को लागू किया गया तो उनका आने वाला कल मुसीबतों से भरा हो जाएगा।

 

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