नक्सलियों के चंगुल से 6 दिनों बाद पुलिसकर्मी पति को छुड़ा लाई पत्नी, पुलिस की नौकरी न करने की शर्त पर बख्शी जान

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चैतन्य भारत न्यूज

बीजापुर. एक पत्नी की ताकत के आगे तो भगवान को भी झुकना पड़ता है तो इंसान क्या चीज है। ऐसा ही कुछ छत्तीसगढ़ के बीजापुर के सुकमा जिले में देखने को मिला। दरअसल 6 दिन पहले नक्सलियों ने जगरगुंडा निवासी संतोष कट्टम का अपहरण कर लिया था। फिर संतोष की पत्नी ने अपने पति को छुड़ाने के लिए रात दिन मेहनत की। वह दर-दर भटकी और कई लोगों से मुलाकात की। फिर गांव वालों के दबाव में आने बाद आखिरकार नक्सलियों को पुलिस के जवान संतोष कट्टम को छोड़ना ही पड़ा।

दरअसल, जगरगुंडा निवासी संतोष पुलिस विभाग में इलेक्ट्रीशियन के पद भोपालपटनम में तैनात हैं। वह छुट्टी लेकर बीजापुर आया हुआ था और तभी कोरोना सकंट के चलते लॉकडाउन हो गया जिसके कारण वह घर में ही फंस गया। चार मई को संतोष गोरना में आयोजित वार्षिक मेला देखने के लिए गया था। मंदिर में दर्शन करने के बाद वह दोस्त का इंतजार कर रहा था कि तभी ग्रामीण वेशभूषा में मौजूद नक्सली को संतोष पर शक हो गया। जब उन्हें पता चला कि सतोष एक पुलिसकर्मी है तो फिर उन्होंने तुरंत उसका अपहरण कर लिया।

नक्सलियों ने संतोष के दोनों हाथ पीछे बांध दिए गए और आंखों पर पट्टी बांध दी और वे उसे जंगल में लेकर चलते रहे। संतोष को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि नक्सली उसे कहा ले जा रहे हैं। मौत का साया उसके साथ चल रहा था जिसे वो महसूस तो कर सकता था लेकिन देख नहीं सकता था। 6 दिन तक आंखों पर पट्टी बांधे वह जंगल में भटकता रहा। जैसे ही संतोष के अपहरण की खबर गांव तक पहुंची तो कोहराम मच गया। पत्नी सुनीता और 15 वर्षीय बेटी भावना के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

पति का पता लगाने के लिए सुनीता चार दिन तक जंगलों को छानती रही। सुनीता और भावना संतोष की तलाश में 6 दिन तक घूमते रहे, लेकिन कोई भी सतोष को लेकर जानकारी देने को तैयार नहीं था। फिर कुछ गांव वाले सुनीता की मदद के लिए आगे आए। नक्सली संतोष को लेकर जनअदालत लगाने जा रहे थे जिसमें उन्होंने सुनीता और भावना को भी बुलाया। उनके अलावा हजारों और भी लोग शामिल हुए। यहां संतोष के समर्थन में ग्रामीण खुलकर सामने आए। उन्होंने बताया कि संतोष ने जनता पर कभी भी अत्याचार नहीं किया। इससे नक्सली नेताओं पर दबाव बन गया, क्योंकि अंतत: उनके लिए भी ग्रामीणों का साथ जरूरी है। फिर आखिरकार नक्सलियों ने संतोष को पुलिस की नौकरी छोड़ने की और गांव में ही खेती करने की चेतावनी देते हुए उसे बिना कोई नुकसान पहुंचाए छोड़ दिया।

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