विश्व टेलीविजन दिवस : समय के साथ-साथ तेजी से बढ़ती गई टीवी की दुनिया, दूरदर्शन की गुदगुदाती बातें आज भी हैं याद

चैतन्य भारत न्यूज

21 नवंबर का दिन दुनियाभर में ‘विश्व टेलीविजन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। भले ही आज टीवी चैनल्स पर कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई हो लेकिन जब भी दूरदर्शन का नाम आता है तो अतीत की कई गुदगुदाती बातें याद आ जाती हैं। 1990 तक सिर्फ एक ही चैनल हुआ करता था, दूरदर्शन। हमारा मनोरंजन सिर्फ दूरदर्शन करता था। दूरदर्शन की पहुंच को टक्कर दे पाना अभी भी किसी के बस की बात नहीं है।

टेलीविजन का इतिहास

टेलीविजन का आविष्कार साल 1927 में अमेरिका के वैज्ञानिक जॉन लॉगी बेयर्ड ने किया था। साल 1934 तक टेलीविजन पूरी तरह इलेक्ट्रानिक स्वरूप धारण कर चुका था। 1938 में औपचारिक तौर पर जॉन लॉगी बेयर्ड टेलीविजन को मार्केट में लेकर आए। फिर इसके 2 सालों बाद ही आधुनिक टीवी के स्टेशन खुले और लोग बड़ी संख्या में टीवी खरीदने लग गए। मनोरंजन का सबसे बेहतरीन साधन बन चुके टीवी की अहमियत को वर्ष 1996 में वैश्विक रूप में उस समय पहचान मिली, जब संयुक्त राष्ट्र ने विश्व टेलीविजन दिवस की घोषणा की। साल 1996 में संयुक्त राष्ट्र ने टेलीविजन के प्रभाव को आम जिंदगी में बढ़ता देख 21 नवंबर, 1996 का दिन विश्व टेलीविजन दिवस (World Television Day) के रूप में मनाने की घोषणा की।

भारत में टेलीविजन

टेलीविजन को भारत आने में 32 साल लग गए। 15 सितंबर, 1959 को पहले टेलीविजन का प्रयोग राजधानी दिल्ली में दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना के साथ किया गया था, लेकिन इसका व्यापक प्रसार 1982 में भारत में आयोजित एशियाड खेलों के आयोजन से हुआ।

दूरदर्शन का महत्त्व

टीवी के आविष्कार ने सूचना के क्षेत्र में एक क्रांति का आगाज किया था। शुरुआती दौर में जब दूरदर्शन आया तब यह अधिक प्रभावशाली था। लेकिन बाद के दिनों में मीडिया के और भी माध्यम तैयार हो जाने के कारण दूरदर्शन जैसे माध्यम कमजोर से हो गए। आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जब सूचना संचार के माध्यमों ने हमें अपना गुलाम बना लिया है जिसके अभाव में हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। आज के युवा और भी इसके आदी हो गए है। हालांकि, दूरदर्शन का आज भी अपना महत्व है ग्रामीण स्तर पर तथा शहरी क्षेत्रों में आज भी दूरदर्शन को सबसे विश्वसनीय और पारदर्शी संचार माध्यम माना जाता है।

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